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गायत्री माता का मनुष्य शरीर में जब प्रवेश होता है तो वह सद्बुद्धि रूप में होता है। साधक के विचार और स्वभाव में धीरे-धीरे सतोगुण बढ़ता है और उसमें सतोगुणी प्रवृत्तियों का विकास होता है । बुरे स्वभाव के मनुष्यों की बुराइयाँ क्रमशः घटने लगती हैं और जो अच्छाइयाँ उनमें पहले कभी दिखाई नहीं पड़ती थीं अब दृष्टिगोचर होती हैं।
दया, सेवा, संयम, स्फूर्ति, सत्य, शौर्य, प्रेम यह गुण उनमें दिन दिन बढ़ते हैं । हृदय रूपी उपवन में यह वृक्ष जमते हैं और जब वे फूल-फलों से लदते हैं तो उनके कारण मनुष्य चारों ओर से महकने लगता है । सुंदर मत्त भ्रमरों और कोकिलों के झुंड उसके पीछे फिरते हैं और फल लोभियों की भीड़ उसे घेरे रहती है। यह सात लाभ सप्त तीर्थों में स्नान करने के बराबर हैं। सूर्य के रथ में सात घोड़े जुते रहते हैं । आत्मा के रथ में उपर्युक्त सात सद्गुण ही अश्व हैं, उनके जुत जाने से आत्म-कल्याण का मार्ग बहुत शीघ्र पूरा हो जाता है ।
सद्गुणों से बढ़कर और कोई संपत्ति नहीं। जो व्यक्ति सच्चाई पर आरूढ़ है, अपनी पवित्रता के कारण सदा निर्भय रहता है और किसी बुराई के आगे सिर नहीं झुकाता, जिसके हृदय में दूसरों के लिए सच्चा प्रेम एवं आत्मभाव है, जो दूसरों के दुख देखकर दया से द्रवित हो जाता है, सेवा जिसके जीवन का लक्ष्य है, मन इन्द्रियों पर जिसने संयम प्राप्त किया है तथा परिश्रम के लिए जिसकी नस नाड़ियों में सदा उत्साह रहता है, निराशा आलस्य जिसे छूने तक नहीं पाता, ऐसा व्यक्ति मनुष्य होते हुए भी देवता के समान है ।
लौकिक संपत्तियों से, सांसारिक सुखों से देवी संपत्तियाँ अधिक महत्वपूर्ण एवं मूल्यवान हैं। संसार के पदार्थों से जितना सुख मिलता है उसकी अपेक्षा इन आत्मिक गुणों से अनेक गुना आनंद उपलब्ध हो सकता है। गीता में यों तो २६ दैवी संपदाएँ गिनाई गई हैं, पर उनमें उपर्युक्त सात ही प्रधान हैं। गायत्री माता अपने भक्तों को यह सात संपत्तियाँ प्रदान करती हैं। फलस्वरूप उसकी अंतःभूमिका देवतुल्य हो जाती है और जो सुख देवता लोग सुरपुरी में प्राप्त करते हैं वह सुख साधक को मनुष्य जीवन में अपने सद्गुणों के कारण प्राप्त होता है । जिसके पास दैवी संपदाएँ हैं निश्चय ही वह संसार की समस्त संपत्तियों का स्वामी होने की अपेक्षा अधिक धनी माना जाएगा ।