Your cart is empty
घर की शोभा, आँगन का सौंदर्य, बालकों पर निर्भर रहता है। जिसके घर में हँसते-खेलते बालक हैं उस घर में उत्साह और प्रसन्नता हर घड़ी नाचती रहती है। घर वालों का समय कट जाता है और बुरी परिस्थितियाँ भी बालकों के बीच हँसते-खेलते व्यतीत हो जाती हैं । बच्चों की चिंता में मनुष्य उत्साहपूर्वक अधिक काम करने के लिए प्रेरित होता है । फिजूलखर्ची, हरामखोरी, आवारागर्दी आदि अनेक बुराइयों से बच जाता है । बाल बच्चेदार स्त्री-पुरुषों के चारित्रिक पतन होने की बहुत कम संभावना रहती है।
यद्यपि आज के युग में अत्यधिक बढ़ी हुई जनसंख्या को देखते हुए जितने बालक कम हों उतना ही अच्छा है। जिसके संतान न हो, उसे भी माता की विशेष कृपा मानकर अपना शिशुपालन वाला समय लोक सेवा और आत्म साधना में लगाना चाहिए। पर यदि संतान हो भी तो वह ऐसी होनी चाहिए जो कुल को उज्ज्वल करने वाली और माता-पिता के यश को बढ़ाने वाली हो ।
वासना से प्रेरित होकर किया हुआ गर्भाधान वैसा ही फल उत्पन्न करता है जैसा कि पति-पत्नी का उद्देश्य होता है ऐसे बालक स्वार्थ और वासना की निकृष्ट भावनाओं से भरे होते हैं, वे छोटेपन से ही अवज्ञाकारी और दुर्गुणी होते हैं और बड़े होने पर माता को अपमान, शोषण, कष्ट एवं अपयश ही देते हैं। ऐसी सन्तान पर माता-पिता ने जो त्याग किया था उसका स्मरण करके उन्हें अपने श्रम की निस्सारता, निरर्थकता और असफलता पर भारी खेद होता है। तब वे कहते है कि कुपात्र संतान होने से संतान रहित रहना हजार गुना अच्छा है ।
ऐसी विषम स्थिति में गायत्री उपासक को नहीं पड़ना पड़ता । उनके विचार उच्चकोटि के होने से संतान भी वैसी मनोभूमि लेकर आती है । द्रौपदी और अर्जुन की शिक्षाएँ गर्भ में ही सीखकर जैसे अभिमन्यु पैदा हुआ था, वैसे ही गायत्री साधक, सतोगुणी माता-पिता के संस्कार लेकर जो बालक जन्म लेते हैं, वह बड़े होने पर ऐसे बनते हैं जिनके गुण, कर्म, स्वभाव, पराक्रम एवं प्रतिष्ठा को देखकर माता-पिता को संतोष होता है और वे अपने श्रम को सफल हुआ समझते हैं। ऐसी संतान ही अपने माता-पिता को संतोष देती है और उनके यश को बढ़ाती और सेवा करती है। बिगड़ी हुई संतान का सुधार, उसकी बुद्धि में हेर-फेर, शुभ संस्कारों की स्थापना आदि कार्यों के लिए गायत्री उपासना बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है ।