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शत्रुओं की कमी नहीं। हमारे भीतर और बाहर अगणित शत्रुओं की सेना फैली हुई है, जो इस घात में रहती है, कब अवसर पावें और कब आक्रमण करें। सजग रहते हुए भी कई बार ऐसे अवसर आते हैं, जब थोड़ी सी भूल हो जाए और उस मौके को ताक शत्रुओं की सेना अपना आक्रमण कर दे ।
मनोविकार हमारे सबसे बड़े शत्रु हैं। थोड़ा सा प्रलोभन, आकर्षण, अवसर सहयोग पाकर वे प्रबल हो उठते हैं और ऐसे कृत्य करा डालते हैं जिन पर पीछे बड़ा पश्चात्ताप होता है, हानि उठानी पड़ती है । रोग, शोक, मृत्यु, अकाल, आपत्ति, हानि, विरोध, दारिद्र्य, संघर्ष आदि के ऐसे आकस्मिक अज्ञात संकट सामने आ जाते हैं, जिन्हें प्रारब्ध शत्रु कह सकते हैं । इनके अतिरिक्त कुछ मनुष्य भी शत्रु हैं, जिनसे किसी कारणवश द्वेष या मनोमालिन्य हो जाता है, वे शत्रुता और प्रतिहिंसा की भावना से प्रेरित होकर सदा हानि पहुँचाने का ही प्रयत्न करते रहते हैं ।
शत्रुओं से अनेक हानियाँ हैं, वे हमारी शक्तियों को आत्मरक्षा की चिंता में अटकाए रहते हैं। उन्नति के लिए जिस समय, शक्ति और पुरुषार्थ को लगाया जाना चाहिए था वह शत्रुओं की रोकथाम में ही लगता है। इसके अतिरिक्त कभी-कभी उनका ऐसा आक्रमण भी हो जाता है जिसकी चोट अपने को तिलमिला देती है और उसका आघात बहुत समय तक दर्द करता रहता है। शत्रुओं से रहित व्यक्ति वस्तुतः बड़ा सौभाग्यशाली है । ऐसे भाग्यवान् को 'अजात शत्रु' कहते हैं ।
गायत्री का 'क्लीं' रूप संहारक है। उसे दुर्गा, काली, चंडी आदि नामों से भी संबोधित किया जाता है। भक्त की रक्षा के लिए माता अपना यही रौद्र रूप ग्रहण करती है और सिंह के समान विपुल पराक्रम के साथ त्रिशूल लेकर उन शत्रुओं का संहार करती है, जो भक्त को अनुचित रूप से त्रास देते हैं। दुष्टों की शक्ति चाहे जितनी बढ़ी-चढ़ी हो, उनकी भयंकरता चाहे कितनी ही विकराल लगती हो पर माता की शक्ति का प्रतिरोध उनसे नहीं हो सकता। रावण, कंस, हिरण्यकशिपु, भस्मासुर, दुर्योधन आदि दुष्टों की जो शक्ति नष्ट कर सकती है, उसके लिए कोई दुष्ट ऐसा नहीं जो परास्त न हो। द्वेष के स्थान पर प्रेम, कलह के स्थान पर शांति, संघर्ष के स्थान पर सहयोग उत्पन्न कर देना माता के एक कृपा कण से ही संभव हो जाता है ।