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ईश्वर की अनंत शक्तियों में से दिव्य ज्ञान का प्रकाश करने वाली परम सतोगुणी शक्ति को ब्रह्माणी, ब्राह्मणी या ब्रह्म-विद्या कहते हैं । ब्रह्माजी ज्ञान के देवता है, वेदज्ञान, तत्वज्ञान उन्हीं के द्वारा निःसृत होता है। ब्रह्मा के चार मुख चारों वेदों के प्रतीक हैं । धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के चारों फल इस ज्ञान के आधार पर ही प्राप्त होते हैं । चार अवस्था, चार आश्रम, चार वर्ण, जीवों के चार वर्ग संसार की चार दिशाएँ आदि चतुर्वर्गों की संपूर्ण समस्याएँ ब्रह्मज्ञान के आधार पर ही होती हैं इसलिए ब्रह्माजी की-ब्रह्म विद्या को चतुर्मुखी कहा गया है ।
ब्रह्मा की शक्ति ब्राह्मी है। किसी देवता, जीव या पदार्थ की शक्ति ही उसका सार है। शक्ति न रहे तो उसका नाम शेष रह जाता है, दूसरों को लाभ पहुँचाना तो दूर वह अपने अस्तित्व की रक्षा भी नहीं कर सकता है। इसलिए ब्रह्मा की क्षमता भी उसकी ब्राह्मी शक्ति में ही मानी गई है। साधक इस सूक्ष्म भाग की, सार अंश की उपासना करते हैं । ब्रह्मा की अपेक्षा ब्राह्मी शक्ति की महत्ता इसलिए अधिक है कि वह एक विस्तृत देव-तत्व का निचोड़ा हुआ अत्यंत प्रभावपूर्ण तत्व है । गायत्री को इसलिए ब्राह्मी कहते हैं कि वह ब्रह्मज्ञान की केन्द्रीय तत्व शक्ति है ।
गायत्री के ब्राह्मी स्वरूप की उपासना करने से साधक के अंतः करण में ब्रह्मज्ञान, तत्वबोध, ऋतंभरा प्रज्ञा एवं सूक्ष्म दृष्टि का आविर्भाव होता है, जिससे माया का अज्ञानांधकार हट जाता है और जीव, प्रकृति एवं ईश्वर का पारस्परिक संबंध भली प्रकार समझ में आ सकता है । जो ज्ञान असंख्यों ग्रंथ पढ़ने और हजारों विद्वानों के प्रवचन सुनने से प्राप्त नहीं होता वह ब्राह्मी शक्ति की कृपा से साधक की अंतःभूमि में स्वयंमेव प्रकट हो जाता है। उस महाशक्ति द्वारा फेंकी हुई ज्ञान किरण जब मनुष्य के मानस तथा हृदय में प्रवेश करती है तो उसके दिव्य प्रकाश में सत्य का, आत्मा का साक्षात्कार होता है ।
ब्रह्मज्ञान हो जाने का फल है-जीवन मुक्ति । आत्मा स्वयं आनंद स्वरूप है, आत्म-ज्ञान होने के साथ-साथ साधक को ब्रह्मानंद का ऐसा रसास्वादन होता है जिसकी तुलना में संसार के समस्त रस उसे अत्यंत तुच्छ प्रतीत होते हैं ।