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पिता को पुत्र और माता को पुत्रियाँ अधिक प्यारी होती हैं । नारी हृदय को जितनी अच्छी तरह नारी समझती है उतना नर नहीं समझता । गायत्री माता को अपनी पुत्रियाँ परमप्रिय हैं। उनकी स्वल्प साधना का भी परम करुणामयी माता पर विशेष प्रभाव होता है। स्त्रियों में स्वभावतः कोमलता, सात्विकता और भक्ति भावना का अंश अधिक होता है इसलिए वे माता की कृपा और भी शीघ्र प्राप्त कर सकती हैं।
पुरुषों की भाँति स्त्रियों को भी गायत्री साधना का अधिकार है । माता के लिए पुत्र और पुत्रियाँ दोनों ही प्रिय हैं, दोनों ही उसकी आँखों के तारे हैं। वे दोनों को ही समान प्रेम से अपनी गोदी में बिठाती हैं । आत्मा को परमात्मा से मिलाने वाली गायत्री रूपी सीढ़ी पर चढ़ने का पुरुषों की भाँति स्त्रियों को भी अधिकार है ।
प्राचीनकाल में अनेक महिलाओं को गायत्री उपासना द्वारा परम सिद्धावस्था की प्राप्ति हुई थी । अब भी अनेक महिलाएँ माता की उपासना करके आत्मोन्नति, सांसारिक सुख समृद्धि की प्राप्ति एवं अनेक आपत्तियों से छुटकारा पाने की प्रसन्नता अनुभव कर रही हैं । विधवा बहिनों के लिए तो गायत्री साधना एक तपश्चर्या है। इससे उनके मनोविकार शांत होते हैं। शोक वियोग की जलन बुझती है और बुद्धि में सात्विकता आने से साध्वी जैसा ईश्वर परायण जीवन बनाना सुगम हो जाता है ।
गायत्री उपासना करने वाली देवियों का जीवन बड़ा सुख शांतिमय बनता है । उत्तम स्वास्थ्य, मुख पर ओज, संतान की सुख-शांति, अविचल सुहाग, बुरे स्वभाव का सुधार, कुमारियों को उत्तम घर-वर की संभावना, दरिद्रता का निवारण, पति और पितृकुलों का मंगल, प्रतिष्ठा वृद्धि, पति का प्रेम, गृह दशा, भूत-बाधा आदि उलझनों का निवारण आदि अनेकों लाभ मिलते हैं, सांसारिक कठिनाइयाँ दूर होती हैं। इसके अतिरिक्त उनकी आत्मिक प्रगति होती चलती है, जिससे परलोक में दिव्य सुख, आगामी जन्म में राजसी वैभव तथा स्वर्ग एवं जीवन मुक्ति का द्वार खुलता है ।
कुमारियाँ, सधवाएँ, विधवाएँ, वृद्धाएँ सभी श्रेणी की स्त्रियाँ गायत्री माता की पूजा, उपासना करके स्वयं सुखी बन सकती हैं और अपने परिवार को सुखी बना सकती हैं ।