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जीवन के हर क्षेत्र में शिक्षक की आवश्यकता है। जो कार्य अनजान आदमी मुद्दतों से नहीं कर पाता, वह अनुभवी शिक्षक की सहायता से सरलतापूर्वक पूरा हो जाता है । भौतिक प्रयोजनों में तो चाहे बिना शिक्षक के काम चल जाए पर अध्यात्म मार्ग में, विशेषकर गायत्री उपासना में तो बिना गुरु के थोड़ी प्रगति नहीं हो पाती । पुस्तकों या प्रवचनों से एक सैद्धांतिक जानकारी मिलती है, व्यक्तिगत कार्य प्रणाली को निर्धारित करने के लिए तो व्यक्तिगत पथ-प्रदर्शक की आवश्यकता होती है, जिसे कोई अनुभवी ही कर सकता है ।
सद्गुरु मिल जाना, आधी सफलता मिल जाने के बराबर है, परंतु यह कार्य है बड़ा कठिन, क्योंकि एक तो सुयोग्य पथ-प्रदर्शकों का ही अभाव हो चला है, जो हैं वे पहचान में नहीं आते, क्योंकि असली की अपेक्षा नकली वस्तु अधिक चमकीली और लुभावनी होती है । सच्चे संत सीधे सरल ढंग से रहते हैं, जिससे वे मामूली आदमी प्रतीत होते हैं। उनकी महिमा साधारण दृष्टि से समझ में नहीं आती । नकली लोग जो बहुत आडंबर बनाए होते हैं, वे भोले साधक को ठीक रास्ता बनाने में समर्थ नहीं होते, क्योंकि जो रास्ता स्वयं ही नहीं देखा वह दूसरों को क्या दिखाया जा सकता है।
गायत्री माता की कृपा जब साधक पर होती है तो बड़ी सरलता से, स्वल्प प्रयास से सद्गुरु की प्राप्ति हो जाती है। बहुत खोज नहीं करनी पड़ती और पथ-प्रदर्शन के लिए उनसे बहुत प्रार्थना एवं खुशामद भी नहीं करनी पड़ती। सहज ही पथ-प्रदर्शन आरंभ हो जाता है और बाधाओं के धने वन में से उँगली पकड़कर वे सरल मार्ग से चरम लक्ष्य तक पहुँचा देती हैं। रास्ते के कुश-कंटक, सर्प, बिच्छू उसे कोई हानि नहीं पहुँचा पाते और दिशा भूल जाने का भय नहीं होता । बालक ध्रुव को नारद जी का सहज पथ प्रदर्शन मिल गया था । उसी प्रकार जिस पर माता की कृपा होती है, उसे भी कोई न कोई सच्चा सहायक एवं पथ प्रदर्शक सद्गुरु अनायास ही प्राप्त हो जाता है ।