गायत्री की शक्ति गति, क्रिया और प्रतिक्रिया को देखते हुए सूक्ष्म-दर्शी ऋषियों ने उसका चित्रण पंचमुखी और दशभुजी रूप में किया है । प्रणव, व्याहृति और मंत्र के तीन भाग यह गायत्री के पाँच मुख हैं। पाँच देव भी इन पाँच मुखों के प्रतीक हैं। पाँच तत्वों से बना हुआ शरीर और पाँच प्राण, पाँच उप-प्राण, पाँच तन्मात्राएँ, पाँच यज्ञ, पाँच अग्नि, पंच क्लेश आदि अनेक पंचकों का रहस्य, मर्म और तत्वज्ञान गायत्री मंत्र के मुख से मुखरित होता है। विश्वव्यापी यह पाँच समस्याएँ सुलझाने के लिए गायत्री के पाँच अंगों में समस्त ज्ञान-विज्ञान मौजूद देखकर ऋषियों ने उसे पाँच मुखी चित्रित किया ।
पाँच मुखों का रहस्य जानकर साधक अपने सांसारिक जीवन में स्वास्थ्य, धन, विद्या, चातुर्य तथा दूसरों का सहयोग प्राप्त करता है और आत्मिक क्षेत्र आत्मज्ञान, आत्म-दर्शन, आत्म-अनुभव, आत्म-लाभऔर आत्म-कल्याण का अधिकार बनता है। यह पाँच सांसारिक लाभगायत्री की बाँई पाँच भुजा हैं और यह आत्मिक पाँच लाभ दाहिनी पाँच भुजाएँ हैं। दशभुजी गायत्री का चित्रण इसी आधार पर हुआ है। जैसे पूर्व, पश्चिम आदि १० दिशाएँ होती हैं वैसे ही जीवन विकास की भी दस दिशा हैं। माता के दस हाथ साधक को उन दशों दिशाओं में समुन्नत करते हैं ।
पंचमुखी और दशमुखी गायत्री का जो वर्णन ग्रंथों में मिलता है वह एक भावना चित्र है, जिससे यह प्रकट होता है कि गायत्री की शक्ति, महिमा और प्रतिक्रिया मानव जीवन में किस प्रकार प्रकट होती है और उसमें कितने प्रकार के रहस्य छिपे हुए हैं, यह एक अलंकारिक रूप है। वास्तव में माता शक्ति रूप है, उसका कोई रूप नहीं । वह शब्द, रूप आदि पंचभौतिक तत्वों से परे है। केवल ध्यान द्वारा उसको अपनी ओर आकर्षित करने के लिए किसी रूप या प्रतिमा की धारणा की जाती है ।
गायत्री के पाँच मुख हैं, दस भुजाएँ हैं, इतना ही नहीं उसके सहस्रों नेत्र, सहस्रों कान, सहस्रों चरण, सहस्रों हाथ हैं। वह सर्वव्यापिनी, अंतर्यामिनी, सर्वशक्तिशाली एवं महामहिमामयी है। इससे संबंधित ज्ञान-विज्ञान का समुद्र इतना गहरा है कि मनुष्य की बुद्धि उसे पार करने में असमर्थ ही रहती है। उसका तो आशीर्वाद ही अभीष्ट है जो माता का कृपा पात्र है उसी पर सब रहस्य प्रकट होते हैं ।