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मनुष्य जितनी उन्नति करता है या सुख सौभाग्य प्राप्त करता है वह केवल अपने शरीर से नहीं कर लेता, उसे बाहरी सहयोग और सहायता की भी आवश्यकता पड़ती है। जिसे जितनी बाह्य सहायता उपलब्ध होती है वह उतनी ही जल्दी ऊपर उठता जाता है । अकेले आदमी की शक्ति बड़ी सीमित होती है, जब उसे अनेकों की अनेक प्रकार से सहायताएँ उपलब्ध होती हैं तभी वह सफलता की मंजिल पार कर पाता है ।
कुछ सहायताएँ प्रत्यक्ष होती हैं कुछ अप्रत्यक्ष । प्रत्यक्ष सहायताओं की जानकारी रहती है, उस सहायता करने वाले के उपकार का मूल्य और वजन सब जानते हैं क्योंकि आँखों से उसे प्रत्यक्ष देखा गया है। अप्रत्यक्ष सहायताएँ ऐसी होती हैं जो आँखों से स्पष्ट दिखाई नहीं पड़तीं, वे सीधी आकाश से आंगन में भी नहीं गिरतीं वरन् किसी मध्यस्थ द्वारा या किसी बहाने प्राप्त होती हैं। हम इनके मूल्य और वजन को भले ही न समझें पर उनका महत्व असाधारण है । दैवी सहायता मिलना जब बंद हो जाता है तब बहुधा ऐसा कहा जाता है कि अब हमारा भाग्य सहायता नहीं देता और प्रबल पुरुषार्थ भी निरर्थक जा रहा है।
जब दैवी सहायता प्राप्त होती है तब ऐसे विचित्र सुअवसर प्राप्त होते हैं कि अपने प्रयत्न का सुअवसर से विशेष संबंध नहीं दीखता । जहाँ उसी परिस्थिति के उसी योग्यता के उसी स्थान के अनेक व्यक्ति जहाँ के तहाँ हीन अवस्था में पड़े रह जाते हैं वहाँ एक मनुष्य विशेष रूप से ऐसी सफलता का अवसर, लाभ या सौभाग्य प्राप्त करता है जिसके लिए अनेकों तरसते हैं, तो वह लाभ दैवी सहायता के कारण ही समझा जाना चाहिए। तब दैव की अनुकूलता से मिट्टी, धूल से सोना होने की उक्ति चरितार्थ होती है।
प्रारब्ध, भाग्य, विधि का विधान, ईश्वर इच्छा तथा दैवी सहायता, हमारे बुरे भले कर्मों से संबंधित है। गायत्री तप की गर्मी से पुराने कच्चे सुकृत शीघ्र पक जाते हैं और जो लाभ बहुत काल पश्चात् मिलना चाहिए था वह शीघ्र मिल जाता है। तप की अग्नि में अनेक पाप और दुर्भाग्य जल भी जाते हैं। देखा है कि अग्रसर होने वाले साधकों को अनेक बार ऐसी आकस्मिक सहायताएँ मिलती हैं, मानो माता ने ही आंतरिक लोक से वह सब साधन सुविधाएँ भेजी हों ।