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आत्मा को परमात्मा में मिला देना, जोड़ देना, यही योग का उद्देश्य है । परमात्मा से बिछड़ी हुई आत्मा जब तक अपने उद्गम केंद्र में नहीं मिल जाती, तब तक वह माता से बिछड़े बच्चे की तरह दुखी और अशांत रहती है। जन्म-मरण के चक्र में नाचता हुआ जीव चौरासी लाख यौनियों में फिरता रहता है और नाना प्रकार के त्रास सहता हुआ वासना और कामना के संस्कारों में बँधकर घिसटता रहता है ।
इस दुरव्यवस्था से त्राण पाने के लिए आध्यात्मिक साधना का पथ है। योगी लोग संसार का त्याग करके अत्यंत कष्ट साध्य तपश्चर्याएँ करते हैं, जिससे भव-बंधनों को कटा कर परमात्मा को प्राप्त कर सकें । सत्संग, स्वाध्याय, कथा, जप, यज्ञ, तीर्थ, दान आदि में यही उद्देश्य प्रधान रहता है कि बंधनों से छुटकारा प्राप्त करके आत्मा अपने उद्गम केंद्र परमात्मा का साक्षात्कार कर सके, उसमें लीन हो सके । यही जीवन का परम लक्ष्य है। मुक्ति को ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ माना गया है। जिसने यह सफलता प्राप्त कर ली, समझना चाहिए कि उसने जीवन लाभ पा लिया, वह धन्य हो गया ।
ऊर्ध्वगति के लिए जितने भी साधन हैं उनमें गायत्री उपासना सर्वश्रेष्ठ है । जैसे बँधी हुई कली सूर्य की उष्णता पाकर आप खुलने लगती और थोड़े ही काल में सुविकसित पुष्प बन जाती है उसी प्रकार आत्मा के बंधन भी गायत्री से अपने आप खुलने लगते हैं और अंतःभूमिका विकसित होकर कुछ समय में उस स्थिति पर पहुँच जाती है, जिसे परहंस गति, सिद्धावस्था, समाधि, आत्म साक्षात्कार, बंधनमुक्ति, ईश्वर प्राप्ति, ब्रह्म निर्वाण या परमानंद कहते हैं ।
सदन कसाई, गणिका, अजामिल, हिरण्यकशिपु आदि दुष्टों का उद्धार हुआ तथा शबरी, अहिल्या, द्रौपदी, वृन्दा आदि नारियाँ और जटायु, निषाद, नरसी जैसे साधारण श्रेणी के जीव सद्गति को प्राप्त हुए । ऐसी भगवत्कृपा, जिससे स्वल्प प्रयास में ही जीव तर जाए, गायत्री माता के अनुग्रह से प्राप्त हो सकती है ।
चित्र में पंचाक्षरी गायत्री
इस पुस्तक में चित्रों के साथ पूरा गायत्री मंत्र न देकर स्थानाभाव से संक्षिप्त पंचाक्षरी गायत्री (ॐ भूर्भुवः स्वः) ही दिया गया है। पंचाक्षरी से ही पूर्ण मंत्र का उद्भव हुआ है इसलिए मूलमंत्र भी वही है ।