प्रारब्ध बड़ा प्रबल होता है। ब्रह्मा ने जो विधान जिसके लिए लिख दिया है उसे हटाना या मिटाना किसी के वश की बात नहीं । पांडवों के श्रीकृष्ण जैसे सहायक होते हुए भी उन्हें जीवन भर नाना प्रकार के दुख उठाने पड़े। नल, दमयंती, हरिश्चंद्र, शैव्या, दशरथ, विक्रमादित्य आदि महापुरुषों के सामने जो आपत्तियाँ आईं उनके प्रबल सहायक भी उन्हें न हटा सके। इस कर्म रेखा की अमिटता को देखकर ही सूरदास ने कहा था-
करमगति टारे नाहिं टरै । गुरु वशिष्ठ पंडित बड़ ज्ञानी, रचि पचि लगन धेरै । पिता मरण और हरण सिया को वन-वन विपत परै ।
पूर्व संचित कर्मों के कारण जो भला-बुरा प्रारब्ध बन जाता है, वह भुगतना ही पड़ता है । कोई कितना ही साधु, सत्पुरुष, सज्जन शुभ कर्म करने वाला क्यों न हो उसके पूर्वकृत कर्म प्रारब्ध रूप से जब सामने उपस्थित होंगे उसका परिणाम भुगतना ही होगा। वर्तमान पुण्य, तप या शुभ कर्मों का प्रतिफल तो आगे चलकर, उनका परिपाक होने पर ही मिलेगा ।
हतना होने पर भी माता की कृपा से कठिन प्रारब्धों में संशोधन हो जाता है । अत्यंत दुस्तर और असह्य कष्टों की यातना हल्की होकर बड़ी सरल रीति से भुगत जाती है। कई बार घनघोर घटाएँ आकाश में उठती हैं, उनमें बड़ी मात्रा में जल भरा होता है। वे बरसें तो मूसलाधार वर्षा करती है, पर यदि किसी प्रकार तीव्र वायु उसी समय चलने लगे तो वह जमी हुई घटा हट जाती है और थोड़ी बूँदा-बाँदी होकर बादल चले जाते हैं। मनुष्य के भाग्याकाश मैं इसी प्रकार कई बार बड़े दुस्तर प्रारब्ध होते हैं, पर वे माता की कृपा से चिह्न-पूजा जैसा परिणाम दिखाकर इस प्रकार उतर जाते हैं कि पहले जितना भय दिखाई पड़ता था, वस्तुतः उसका एक अंश ही सामने आता है ।
पूर्ण रूप से प्रारब्ध परिवर्तन तो असंभव है पर माता की कृपा से इसमें अनेक संशोधन और परिवर्तन हो सकते हैं। भविष्य के लिए उत्तम भाग्य हो सकता है। चित्र में गायत्री माता साधक के भाग्य पटल में आवश्यक हेर-फेर कर रही है, उसके पूर्व निर्मित प्रारब्ध में कुछ परिवर्तन किया जा रहा है ।