Welcome to the new platform of Swawlamban — Your trusted Ayurvedic store!
Cart (0)

Your cart is empty

अध्याय 12 / २४

बंधन से मुक्ति

Gayatri Mahatmya - Swawlamban

मनुष्य अनेक बंधनों में बँधा हुआ है, जिस प्रकार जाल में जकड़ा हुआ पक्षी अपनी वर्तमान स्थिति में दुखी होता है और उससे छुटकारा पाना चाहता है, पर सफल मनोरथ नहीं हो पाता, उसी प्रकार मनुष्य भी अपनी परिस्थितियों से दुखी रहता है। अपनी बुरी आदतों के दुष्परिणाम भुगतता है, परंतु उनसे छुटकारा नहीं मिलता । रास्ता खोजता है, पर मार्ग नहीं मिलता। जेलखाने में बंद पड़े हुए कैदी की तरह उसके प्रयास विफल होते रहते हैं और मुक्ति का द्वार बंद दिखाई पड़ता है।

ये बंधन क्या हैं ? कैसे हैं? किसके द्वारा बाँधे गए हैं ? इतना समझना भी कठिन है। आत्मज्ञान का जब प्रकाश होता है, तभी उनकी गाँठें दिखाई देती हैं। रामायण उत्तरकांड में ज्ञान दीप वर्णन में गोस्वामी जी ने इन बंधन ग्रंथियों के खोलने का मार्ग बताया है। अपने कुसंस्कार, दूषित दृष्टिकोण, दुर्व्यसन, माया के प्रलोभन, अविद्या का अंधकार, काम, क्रोध, लोभ, मद, मोह का दुष्प्रभाव, कुकर्म आदि के कारण चित्त की मलीन दशा ही अधम जन्म और बंधन का प्रधान कारण है ।

प्राणी जिन जंजीरों में बँधा हुआ नारकीय बंधन की यातनाएँ सहता है उन जंजीरों की कड़ी धातु की हैं, आसानी से नहीं टूटतीं । योगी, यती, साधु एवं तपस्वी भी फिसल पड़ते हैं और फिर उन्हीं प्रलोभनों के कुचक्र में फँस जाते हैं । इन्द्र और चंद्रमा जैसे देवता, व्यास और विश्वामित्र जैसे ऋषि जिन कुसंस्कारों से फिसल पड़े उनसे साधारण जीवों का मोहित रहना कोई आश्चर्य की बात नहीं ।

माता की कृपा का वरदान जब साधक अपनी तपस्या द्वारा प्राप्त करता है तो उसे दिव्य शक्ति की ऐसी सहायता प्राप्त होती है जिसके कारण अनेकों जंजीर कट जाती हैं। कर्म बंधन, भोग-बंधन, संस्कार-बंधन, स्वभाव बंधन, मोह-बंधन आदि जंजीरें, माता की दिव्य शक्ति से कट जाती हैं, तो साधक को जीवन मुक्त दशा का ब्रह्मनंद सहज ही प्राप्त होने लगता है। आजीवन कैद से छूटने वाले कैदी तथा जाल में जकड़े हुए पक्षी को छुटकारा मिलने पर जो सुख होता है उससे अनेकों गुना सुख भवबंधन में असंख्य जन्मों से जकडे हुए प्राणी को' मुक्ति' पाकर उपलब्ध होता है। इस आनंद को प्राप्त करने का मार्ग गायत्री माता की शरणागति ही है ।


होम

विषय सूची

PDF

संदेश

प्रोफ़ाइल