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सांसारिक जीवन में शरीर रक्षा के लिए अन्न, वस्त्र आदि आवश्यकताओं के उपरांत सब से बड़ी आवश्यकता 'संतुष्ट दांपत्य जीवन' की है। जिसे इस क्षेत्र में अभाव, बुद्धि, विकृति एवं असंतोष होगा वह अन्य सब प्रकार के भौतिक सुख साधनों से संपन्न होते हुए भी संतुष्ट न रह सकेगा ।
संत, महात्मा, त्यागी, योगी एवं ब्रह्मचारी लोग बहुधा नारी से दूर रहने और उससे घृणा करने के सिद्धांत का प्रतिपादन करते हैं। यह प्रतिपादन निम्नकोटि की मादक उत्तेजक विषय वासना के विरुद्ध है । इसके अतिरिक्त अन्य सभी रूपों में नारी परंपरा आदरणीय, श्रद्धास्पद, पूजनीय है। उनमें स्वभावतः पुरुष की अपेक्षा देव-तत्व अधिक होता है। माता, बहिन, बेटी और धर्मपत्नी के रूप में उनकी महिमा का जितना गान भारतीय ऋषियों ने किया है उतना सम्मान और किसी ने नहीं किया । नारी अर्धांगिनी है, उसके बिना पुरुष अधूरा है। हमारे सभी देवता सपत्नीक थे और अधिकांश ऋषि मुनि अपनी धर्मपत्नियों सहित तपस्या करते थे। नारी की उपयोगिता सेवा, सहायता की आवश्कता पुरुष को है और पुरुष की नारी को। गृहस्थ भी माता की कृपा एवं सफलता का उतना ही अधिकारी है, जितना विरक्त ।
गायत्री माता की छत्रछाया प्राप्त करने वाले साधकों का दांपत्य जीवन अतीव सुमधुर होता है। कुमारियाँ यदि उपासना करें तो उत्तम वर तथा अनुकूल कन्या मिलती है कुमारों को सेवा भावी मनोवांछित पत्नी प्राप्ति होती है। विवाहित पति-पत्नी में यदि पारस्परिक मनोमालिन्य, रुचि प्रतिकूलता तथा कलह के कारण विद्यमान हों तो उनका समाधान होता है। दांपत्य जीवन में कलह उत्पन्न करने वाले अनेक कारण होते हैं, शरीर मन स्वभाव, कार्य एवं विचारों में कुछ ऐसी प्रतिकूलता रहती है जिसके कारण दोनों में एकता, सरसता एवं स्नेहशीलता उत्पन्न नहीं हो पाती है। इन्हीं असंतुष्ट जीवनों में माता की कृपा की वर्षा होने से परिवर्तन होते हैं जिनसे प्रतिकूलताएँ अनुकूलता बन जाती हैं और सद्बुद्धि बढ़ने के कारण कलह के बीज अपने आप नष्ट हो जाते हैं ।
गायत्री माता का आशीर्वाद साधक को सुखी और सरस दांपत्य जीवन के रूप में प्राप्त होता है। दोनों एक ही तरफ आत्मीयता के बंधन में बँधकर जीवन को धार्मिक आधार पर व्यतीत करते हैं ।