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शिव को योगेश्वर भी कहते हैं। योग की समस्त शक्तियों और सिद्धियों के उद्गम केन्द्र वे ही हैं। मस्तक पर चंद्रमा तत्वज्ञान का प्रतिनिधि है । गले में सर्पों का होना, दुष्ट और पतितों को भी कंठों से चिपटाने की साधुता का द्योतक है । वृषभ वाहन मजबूती, दृढ़ता, स्थिर चित्त, श्रमशीलता एवं पवित्रता का प्रतीक है। शिव इन्हीं गुणों के समूह हैं । वे संहारक हैं, दोष, दुर्गुण, अनाचार, अविचार और अनुपयुक्तता का संहार करते हैं । अनावश्यक का निवारण और आवश्यक का संहार करने का कार्य ईश्वर के शिव स्वरूप द्वारा होता है। शिव की चेतावनी और गतिशीलता को शांभवी शक्ति कहते हैं ।
गायत्री के शांभवी स्वरूप का आश्रय लेने से जो गुण शिव के हैं शांभवी के हैं उन्हीं का प्रसाद साधक को भी मिलता है। वह शिवजी की ओर बढ़ता है और त्याग, वैराग्य, संयम, साधुता के अतिरिक्त योग की आध्यात्मिक शक्तियों से भी संपन्न होता चलता है। शिव के तीन नेत्र है । तीसरा नेत्र जिसे दिव्य चक्षु कहते हैं, आत्म तेज से परिपूर्ण होता है। यह तीसरा नेत्र शांभवी शक्ति के उपासक का खुलता है । जैसे संजय ने अपनी दिव्य दृष्टि से महाभारत का सारा वृत्तांत घर बैठे देखा था और युद्ध का सारा विवरण धृतराष्ट्र को सुनाया था। ऐसी दिव्य दृष्टि तीसरा नेत्र खुलने से होती है । संसार की सभी ज्ञात-अज्ञात बातें उसे विदित हो सकती हैं। दूसरों के मनोगत विकारों को जान लेना सहज हो जाता है, भूतकालीन इतिहास एवं भविष्य की होतव्यता का भी उसे बडुत कुछ पता लग जाता है । पारदर्शी काँच में होकर जैसे भीतर की वस्तुएँ दिखाई पड़ती हैं, वैसे संसार के अनेकों रहस्य उसे अपनी दृष्टिं से प्रत्यक्ष दिखाई पड़ने लगते हैं ।
शिवजी ने तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को जला दिया था । इसी ब्रह्म तेज के बल से ऋषियों के शाप से मनुष्य भस्म तक हो जाते थे । सगर राजा के सौ पुत्र इसी प्रकार भस्म हुए थे। यह ब्रह्म तेज एक प्रकार विद्युत प्रवाह है। जिसका शक्तिपात करके किसी को लाभान्वित भी किया जा सकता है। साथ ही तांत्रिक मार्ग से उपयोग करने पर अभिचार, मारण आदि के हानिकारक शाप भी फलितार्थ किए जा सकते हैं, परंतु इस ब्रह्मतेज को सांसारिक प्रयोजनों में खर्च करने की भूल न करनी चाहिए, उसका तो एक मात्र सदुपयोग आत्मकल्याण के लिए ही है।