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जब परिवार के सब लोग प्रेमपूर्वक, एक दूसरे की हमदर्दी, सेवा और सहायता करते रहते हैं, एक दूसरे का उचित आदर करते हुए त्याग और उदारता का व्यवहार करते हैं तो घर में स्वर्गीय शांति बिराजती है । सबके सहयोग से घर की आर्थिक स्थिति सुधरती है, उत्पादन बढ़ता और कम खर्च में सारी व्यवस्था हो जाती है, बुरे दिनों को भी हँसते-खेलते काट लेते हैं। उनकी प्रतिष्ठा बढ़ती है और किसी को उन पर आक्रमण करने का साहस नहीं होता । कोई दुस्साहस करता भी है तो उसे उस संगठित कुटुंब के सामने मुँह की खानी पड़ती है।
जिन परिवारों में आपसी ईर्ष्या, द्वेष, तिरस्कार, मनोमालिन्य एवं विरोध के भाव रहते हैं, जहाँ लड़ाई-झगड़ा, कलह, चोरी, दुराचार के दृश्य दिखाई देते हैं, बड़ा छोटों को दबाता है और छोटा बड़ों की इज्जत नहीं करता, चोरी और अपना-अपना स्वार्थ साधन करने की नीति पर जहाँ सब लोग चलते हैं, सामूहिक लाभ और गृह व्यवस्था की ओर ध्यान नहीं देते वह परिवार जल्दी ही नष्ट हो जाता है। उसकी प्रतिष्ठा धूल में मिल जाती है अच्छी आमदनी होने पर भी पूरे नहीं पड़ते, बाहर के लोग उन पर हँसते हैं। चुगलखोर और स्वार्थी लोग ऐसे ही परिवारों में विरोध डालकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। स्वार्थ, द्वेष और ईर्ष्या के कारण वे शीघ्र ही एक दूसरे से अलग हो जाते हैं और बुहारी में से बिखरी हुई सीकों की तरह तथा माला में से टूटे हुए मोतियों की भाँति उस परिवार के सदस्य दुर्गति को प्राप्त होते हैं ।
पारिवारिक अशांति का मुख्य कारण लोगों की कुबुद्धि है । अन्य कारणों को तो आसानी से सुलझाया जा सकता है, पर कुबुद्धि रूपी पिशाचिनी ऐसी प्रचंड है कि यह छुड़ाए नहीं छूटती। जिसके पीछे यह दुष्टा लग जाती है उसे चैन नहीं लेने देती और उसके समीप रहने वाले संबंधित लोग भी त्रास पाते हैं। घर में एक दो आदमी भी कुबुद्धि के हों तो वे शांतिप्रिय लोगों को भी चैन से नहीं बैठने देते और अकारण सबको दुखी होना पड़ता है ।
गायत्री उपासना करने वालों की बुद्धि शुद्धि होती है। जिस घर में गायत्री की पूजा, उपासना, यज्ञ, स्वाध्याय, जप, तप आदि का आयोजन होता रहता है, वहाँ सद्बुद्धि का स्वाभाविक प्रकाश होता है और उस परिवार में विघटनकारी तत्व एवं दुर्गुण अपने आप कम होते हैं। ऐसे धार्मिक परिवारों में सदा सब प्रकार की शांति विराजती देखी जाती है ।